सोमवार, 28 जुलाई 2014

रफ्ता - रफ्ता  की यादों मैं बहुत कुछ है , उन्हीं धुंधली यादों मैं से एक याद हे | पाकिस्तान यात्रा की ...
तारीख तो मुझे याद नहीं लेकिन साल होगा 2003 ..अगर तारीख देखनी होगी तो पासपोर्ट को उलट - पलट कर देखना होगा |
शाम को करीब 4 बजे होंगे जब हम पाकिस्तान हाइ कमीशन मैं थे क्योंकि वीसा मिलना था लेकिन हम को बोला गया कि शाम को सात बजे आना |
वीसा तो मिल गया था लेकिन असल जद्दोजहद जाने की थी क्योंकि उस वक़्त  हवाई रास्ता बंद था | ये  भारत ओर पाक की सरकार का मामला था|
अगर पाक जाना हे ,तो दुबई से जाओ  या फिर बाघा बार्डर से बस जाती हे| ओर अब उसका  टिकिट मिलना मुशकिल क्योंकि बस पूरी फुल थी|
मुझे याद हे हम सभी सिर्फ भाग रहे थे , बस स्टॉप फिर बस स्टॉप से कहीं ओर मैं ओर मेरे साथी जो की मुझ से बहुत  सीनियर थे | मुझे किसी बात की चिंता नहीं थी सारा मीडिया इसी जुगाड़ मैं लगा था की बस , सिर्फ बस हो जाए |तभी रात को करीब 9 बजे  पता चला कि एक बस एक्सट्रा जाएगी | सभी के चहरे चमक गए जैसा मुझे पता चला कि इस सबके पीछे राजदीप जी ओर जसवंत जी की  मेहनत थी |जो भी हो हम सब पाक जाने वाली बस मैं सवार हो गए ओर बस दिल्ली से वाघा बार्डर की तरफ चल दी |
ये सफर पूरी रात का था , हमारी बस के आंगे एक पुलिस की गाड़ी चल रही थी जो की  किसी भी अनहोनी को रोक सके |
दरअसल भारत से कुछ नेता कुछ पत्रकार ओर भी कुछ लोंगों का डेलीगेसन  पाक जा रहा था ओर मीडिया उनको कवर करने |
इस लिस्ट मैं बहुत सारे लोग थे लालू जी, राजीव शुक्ल जी ओर भी लेकिन सारा केंद्र बिन्दु थे लालू जी |
जहां तक मुझे याद हे उस डेलीगेसन का नाम सफमा था । फिलहाल रात का वक़्त था ओर बस तेज़ी से अपने गंतव्य की ओर जा रही थी | मेरे साथ वाली सीट पर एक लड़का बैठा हुआ था नाम मुझे नहीं याद ,लेकिन वो पाक से था ओर हिन्दू  था | वो किस शहर मैं रहता था आज याद नहीं लेकिन उसके साथ जो बातें की उसकी कुछ यादें अब भी हैं | मुझे बताया की हमको भारत आने का वीसा बहुत मुश्किल से मिलता हे हम  जब वीसा की लाइन मैं  लगे होते हैं मारा जाता हे | ओर भी बातें हुई ओर उसने कभी ये नहीं कहा की हमारा पाक, नापाक हे |  सुबह हम बार्डर पर थे |ओर हम सबको  बस से उतार कर एक बस मैं शिफ्ट कर दिया क्योंकि पैदल बार्डर को क्रॉस कर नहीं सकते थे | सभी बस मैं खड़े हो कर बार्डर को क्रॉस किया जो भी खाना पूरी 

मंगलवार, 10 जून 2014

आपके  पास  अगर आपकी यादें  ना हों तो आपके  जीवन को धिक्कार  हे। आप क्या सोच कर जियंगे।
खाली  वक़्त  मैं  आपकी  यादें  हीं आपकी हम सफ़र  होतीं  हैं  कुछ ऐसी ही  यादें हैं जो कभी मेरे सफ़र मैं, हम सफ़र बन कर चली /
रोज़  की तरह सुबह हुई  हाथ मैं पराठा और  ट्रैन को पकड़ने के लिए दौड़। पापा की आवाज़, निकल जाएगी फिर घर से निकलोगे। लेकिन ऐसा होता नहीं था ट्रैन को पकड़ ही लेता था / और  जैसे ही ट्रैन के अंदर दाखिल हुआ। की सामने इलू-पीलू  नज़र आए।
कुछ लिखने से पहले कुछ आपको बता दूँ / कि ये सफर कब और कहाँ होता था
दरअसल मेरा कॉलेज आगरा मैं था और मुझे कोसी कलां से आगरा  रोज आना जाना होता था / और इस सफर मैं कभी अच्छे   तो  कभी बुरे लोग मिले /
हमेशा की तरह आज भी इलू पीलू ने उस सीट पर नज़र डाली की जहाँ लड़की हो,
जैसे ही हम स्लीपर मैं दाखिल हुए  की सामने लक्ष्मण भाई अरे तुम आओ लक्ष्मण मुझ से बड़े थे और म. ड  कर रहे थे बहुत ही सुलझे हुए सिर्फ अपनी पढ़ाई  से मतलब और मैं उनके साथ चल दिया /
ट्रैन ने स्टेशन को पीछे छोड़ दिया था लेकिन  हम अभी तक सीट की तलाश कर रहे थे और कुछ देर के बाद हम सभी एक लेडिस कूपे मैं बैठने  के लिए दाखिल हुए  उस कूपे मैं कोई भी महिला यात्री नहीं थी
इलू पीलू सबसे पहले उस कूपे मैं समां गए और भी कछ लोग थे /और कूपा फुल ठीक तभी एक  आवाज़ आई आप यहाँ बैठ सकते हैं /
नजर गई देखा एक सुन्दर सी  लड़की और एक सरदार जी बैठे हुए है लेकिन  हम कहाँ बैठेंगे मन यही सोच रहा था की सरदार जी बोले आप यहाँ बैठ जाओ , मैं ऊपर  वाली सीट  पर   चला जाता हूँ /
मैं और लक्ष्मण उस सीट पर बैठ गए।
लेकिन कुछ देर के बाद मैंने देखा की कूपे के अंदर से इलू पीलू कुछ तो गड़बड़ कर रहे हैं
जिसकी वजह से वो लड़की परेशान  हे और ये समझते मुझे देर नहीं लगी की इलू-पीलू दोनों उस लड़की को आँख मार रहे थे।
मैंने उस लड़की की तरफ देखा ,
उसने मुझे अपनी सीट पर शिफ्ट होने को बोला और मैं और लक्ष्मण दोनों  शिफ्ट हो गए अब उस लड़की को इलू-पीलू  नज़र नहीं आ रहे थे।
इधर इलू-पीलू दोनों मुझे अंदर से ईशारे  कर रहे थे ये क्या किया लेकिन मैंने उन दोनों को शांत किया और लक्ष्मण भाई  से बातें करने लगा /
कि तभी एक चाय वाला गुजरा।
और उस लड़की ने चाय बाले को रोका भाई चाय देना जब तक चाय बाला  कप मैं चाय डाले उसने सीधे मुझ से पूछा  चाय लेंगे आप। एक बार मन किया मना कर दूँ , लेकिन उसने चाय बाले को बोलकर मेरे और लक्ष्मण भाई के लिए भी चाय बनवा दी हम ने उसको थैंक्स बोला वैसे भी सफर मैं बहुत काम लोग ऐसे मिलते हैं जो आपको खाने पीने के लिए पूंछे और डर भी रहता हे की कब कौन आपको कुछ खिला पिला दे लेकिन यहाँ लूटने का डर कहां , दो चुस्किया चाय की ली थीं की उस लड़की ने मेरी और देख कर कहा ,
आपको मैंने कुछ दिनों पहले देखा था ,
मैंने भी उसको सीधा सा उत्तर दिया हम रोज़ सफर करते हैं  बिलकुल अपने देखा होगा ,
जी नहीं उस लड़की ने कहा ,मैंने आपको एक स्टेशन पर ऊधम करते देखा था.
अब मैं थोड़ा सोच मैं पड गया आखिर कब कहां  मुझे इस लड़की ने देखा हे
तभी उस लड़की ने कहा आपको अगर याद हो तो आप एक पत्थर के खम्बे पर चढ़ कर मस्ती कर रहे थे /
मुझे कुछ याद  आया की करीब एक महीने पहले मैं और मेरे कुछ दोस्तों ने बिल्लौचपुरा  स्टेशन पर खूब ऊधम किया था /
दरअसल ट्रैन वहां रुक गयी थी और  अपने दोस्तों के साथ हम टाइमपास कर रहे थे।
लेकिन कोई हम को इस तरह से देखेगा सोचा नहीं था
मैंने उस लड़की को बोला लेकिन इस बात को एक महीना हो गया होगा और आपको अभी तक याद हे
वो मुस्कराई और खिड़की के बाहर  देखने लगी . सुबह की ठंडी हवा उसकी जुल्फों को उड़ा रही थी
  तो मेरा मज़ाक उड़ा  रही थीं। और मुझे सोचने के लिए मज़बूर कर रही थी की क्या सफर मैं लोग इतना भी गौर करते हैं /
तभी फिर से एक समोसे बाला  आया  और उसने हमको फिर समोसे खिलाए , और हम उसका शुक्रिया अदा किया और राजा मंडी स्टेशन पर उत्तर गए /
लेकिन आज भी जब कभी सफर मैं होता हूँ सोचता हूँ क्या फिर से मुलाकात होगी किसी हमसफ़र से सफर मैं।
फिलहाल ये सफर यहीं ख़त्म होता ,

नीरज जय तिवारी